Tuesday, January 7, 2014
‘आप’ ने दी टोपी को नई पहचान
15 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने टोपी पहनी और पूरा देश टोपी के रंग में रंग गया। इसके बाद में सत्ता परिवर्तन हुआ। देश ने मोरारजी देसाई की टोपी को ईमानदारी, सच्चाई का प्रतीक माना। मोरारजी, जगजीवनराम, चरणसिंह की टोपियां पूरे देश के लिए आदर्श बनीं। आदर्शों, नैतिक बल का जलजला पैदा हुआ। नेहरू टोपी समाजवाद ला रही थी तो जेपी, चरणसिंह, मोरारजी की टोपी समग्र क्रांति से ले कर असली भारत को बदलने की टोपी लिए हुए थी। अन्ना हजारे के आंदोलन ने मानो फिर एक इस टोपी का जीवंत कर दिया और टोपी फिर से दिखाई देने लगी। अन्ना हजारे के आंदोलन से जन्मी आम आदमी की पार्टी ने इस टोपी को अपने से अलग कर लिया और यही टोपी पहकर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रही और आप पार्टी ने दिल्ली विधानसभा में चुनाव जीता बल्कि 28 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और छह मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में इस टोपी की एकरूपता देखने को मिली।
आम आदमी पार्टी ने न केवल टोपी को सम्मान दिया, बल्कि देश के युवाओं को इसके सम्मान के प्रति जागृत कर भारतीय संस्कृति में गुम होती हुई टोपी को नई पहचान दी। आप पार्टी ने वैसा ही काम किया जैसे एक दर्जी कपड़े सिल रहा था। दर्जी कपड़ों को काटने के बाद कैंची को पैरों के नीचे दवा कर रख लेता था और अपने माथे पर पर लगी टोपी को में से सुई निकालकर कपड़े सिलने लग जाता था और फिर जब सुई का काम हो जाता था तो वह सुई को फिर वापस टोपी में रख लेता था। इस स्थिति को देखकर पास में बैठे हुए उसके बच्चे ने बोला-पिताजी आप हमेशा सुई को अपनी टोपी में रखते हैं और कैंची को हमेशा पैरों के नीचे क्यों रखते हो तब पिता मुस्काराया और बोला- बेटा तुमने बिल्कुल सही प्रश्न किया है। अगर तुम इस चीज को समझ लिए तो हमेशा उन्नति के शिखर को पाओंगे, बेटे ने पूछा वो कैसे? पिता बोला- बेटे सुई जोड़ने का काम करती है इसलिए मैं उसे सिर पर रखता हूं और कैंची काटने का काम करती है इसलिए मैं उसे पैरों के नीचे रखता हूं।
शायद यह बात अरविन्द केजरीवाल ने सही समझ पाए और उन्होंने टोपी को शुरू से ही पहने रखा और आज उसी टोपी के छत्र छाया में एक विशाल जनसमूह को खड़ा कर दिया।
जनलोकपाल की मांग को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे की अगुवाई में आंदोलन के बूते बनी आम आदमी पार्टी (आप) कांग्रेस की गांधी टोपी पर कब्जा जमाने में भी कामयाब हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमान के विपरीत ‘आप’ के कारण भाजपा को नहीं, बल्कि कांग्रेस का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन के दौरान गांधी टोपी एक बार फिर देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। गांव-गांव में इस टोपी को नई अपनी पहचान मिली और अन्ना बनाने में कामयाब हुई थी। पूरे आंदोलन के दौरान अन्ना समथर्कों ने टोपी पर लिखा- ‘मैं अन्ना हूं... जनलोकपाल चाहिए...।’
विवाद के चलते अन्ना हजारे के घनिष्ठ सहयोगी रहे अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई। पार्टी के बनाने के बाद आप ने टोपी को नहीं छोड़ा और अन्ना हजारे की जगह उस पर लिखा गया ‘मैं आम आदमी हूं’।
आप की चुनावी सफलता और सरकार बनने के बाद कार्यकर्ताओं के साथ उसके समथर्कों को भी गांधी टोपी खूब भाई और आज ‘आप’ का युवा कार्यकर्ता इसे पहनकर नई ऊर्जा के साथ काम कर रहा है।
अन्ना हजारे आंदोलन और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने न केवल इतिहास रचने में सफल रही है, बल्कि इस टोपी को देश की पहचान बनाने में सफलता भी अर्जित की है। आज आप पार्टी की पहचान उसकी टोपी से बनी है और यह टोपी केवल दिल्ली में ही नहीं देश के कोने-कोने में दिखाई देने की शुरुआत हो चुकी है। देश में इस टोपी का कद धीरे-धीरे और बढ़ रहा है। यही कारण है कि आज विदेशी मीडिया में भी टोपी को लेकर चर्चा जोरों को पर और विदेशी लोगों को इस टोपी से रूबरू होने पर मजबूर कर रहा है। इसके साथ-साथ देश में इस टोपी का चलन बढ़ गया है।
अब आगे देखना यह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की टोपी को ‘आप’ से कितना सफल बनाती है और क्या आप पार्टी इस टोपी को जन-जन तक पहुंचाने में कामयाब रहेगी यह तो वक्त ही बताया पाएगा। किन्तु भारतीय संस्कृति में रची-बसी इस टोपी को नई पहचान देने के लिए ‘आप’ पार्टी साधुवाद की पात्र है।
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